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भारतवर्ष के अतीत की गुणवत्ता वर्तमान से मेल क्यों नहीं खाती?

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भारतवर्ष के अतीत की गुणवत्ता वर्तमान से मेल क्यों नहीं खाती?

आपको फिल्म पूरब पश्चिम का वो गीत "जब जीरो दिया मेरे भारत ने" याद ही होगा। इस गीत को सुनकर विश्व के लिए भारत के योगदान को जानकर कई बार हमारे रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
हमारे अतीत में भारतवर्ष के योगदान के बारे में बताने के लिए इतना कुछ है कि इस पर कई पुस्तकें लिखी जा चुकी हैं।
गणित से लेकर खगोल शास्त्र तक तथा चिकित्सा से लेकर वैमानिक शास्त्र तक भारतवर्ष के वैज्ञानिकों ने अतीत में बहुत काम किया है और अपना विशेष योगदान प्रत्येक क्षेत्र में दिया है।

प्राचीन समय में हमारी सभ्यता सर्वाधिक विकसित सभ्यताओं में से एक रही है। परंतु उस काल से आज तक में हमारे भारतवर्ष की सभ्यता लगातार विकसित ना हो सकी और वर्तमान में हमारी स्थिति विश्व में उस मुकाम पर नहीं है जहां अतीत में हुआ करती थी।

आज हम यहां पर उन 10 कारणों के बारे में चर्चा करेंगे जो भारत के सर्वांगीण विकास में बाधक हैं या पूर्व में बाधक रही हैं।

वास्तव में इतिहास का ज्ञान हमें उससे सबक लेने की प्रेरणा देता है साथ ही यह आगाह करता है कि मानव को इतिहास में हुई भूलों को दोहराना नहीं चाहिए बल्कि उसे सुधार कर बेहतर बनाने के लिए सदैव प्रयत्नशील रहना चाहिए।

1. भारत पर लगातार होने वाले आक्रमण।


सबसे प्राचीन व विकसित सभ्यताओं में से एक हड़प्पा सभ्यता के नष्ट होने के वैसे तो बहुत सारे कारण गिनाए जाते हैं परंतु उनमें से एक कारण, विदेशी आक्रमणकारियों के हमले भी बताए जाते हैं।हमारा भारत वर्ष प्राचीन काल से ही लगातार विदेशी आक्रमणकारियों के हमले झेलता रहा है। ये आक्रमणकारी यहां आकर लूटपाट करते रहे तथा यहां की सभ्यता को लगातार नुकसान पहुंचाते रहे जिससे विभिन्न प्रकार की व्यवस्थाएं जो एक लंबी प्रक्रिया के बाद विकसित होती हैं; वह पिछले 150 वर्षों में ही विकसित हो पाई और पूर्व के वर्षों में नहीं।

2. तीव्र जनसंख्या वृद्धि।


भारतवर्ष की आजादी अर्थात 1947 के समय की आबादी 34 करोड़ से आज वर्तमान में लगभग 134 करोड हो गई है। यह वृद्धि मात्र 70 वर्षों में हुई है। इसी वृद्धि दर से रोजगार के नए नए साधन उपलब्ध कराना किसी भी देश समाज व सरकार के लिए चुनौतीपूर्ण है और हमारा समाज व सरकारें इस चुनौती को पूरा नहीं कर सकी जिसका खामियाजा हम सब को भुगतना पड़ रहा है।

3. युवाओं में सरकारी नौकरी के तीव्र ललक।


भारतवर्ष के युवाओं मे (विशेषकर हिंदी भाषी राज्यों के युवा) सरकारी नौकरी पाने की एक बहुत बड़ी होड़ दिखाई देती है। उदाहरण के लिए रेलवे की 50,000 वैकेंसी के लिए 1.25 करोड़ विद्यार्थी तक आवेदन करते हैं। लाखों की संख्या में युवा 5-5 और कभी-कभी तो 10-10 वर्षों तक सरकारी नौकरी की तैयारी के लिए कोचिंग इत्यादि करते रहते हैं।इस प्रकार युवाओं के जीवन की उत्पादकता के सबसे महत्वपूर्ण वर्ष गैर उत्पादक कार्य में खर्च हो जाते हैं।

4. रोजगार असुरक्षा की भावना।


अत्यधिक जनसंख्या वृद्धि व उस अनुपात में रोजगार सृजन ना होने के कारण युवा अपनी जॉब को लेकर लगातार आशंकित रहते हैं। इंजीनियर, चार्टर्ड अकाउंटेंट जैसे पढ़े लखे लोग भी चपरासी तक की जॉब के लिए तैयार रहते हैं, ज्वाइन भी करते हैं। वास्तव में आधे से अधिक लोगों को अपनी विशेषज्ञता के क्षेत्र में नौकरी नहीं मिल पाती जिस कारण उनकी पढ़ाई लिखाई किसी क्षेत्र में होती है और जॉब किसी क्षेत्र में।

5. शिक्षा व्यवस्था का स्थानीयकरण ना किया जाना।


प्रत्येक राष्ट्र, समाज की समस्याएं, विकास की अवस्थाएं आदि अलग-अलग होती हैं।बच्चों को भी शिक्षा उसी प्रकार के दी जानी चाहिए जो उस समय, समाज राष्ट्र की स्थानीय समस्याओं का समाधान कर सके ना कि ऐसी शिक्षा जिसका उस देश, समाज की समस्याओं से कोई लेना-देना ना हो।

6. राजनीतिक मजबूरियां।


हमारे देश का संविधान विश्व का सबसे लंबा, तथा लोकतंत्र समर्थक संविधान है।परंतु कई बार राजनीतिक पार्टियां इसकी बातों को तोड़ मरोड़ कर आपसी गठजोड़ करके सरकार बना लेती हैं। ये सरकारें बड़े महत्वपूर्ण फैसले नहीं ले पातीं और देश का विकास बाधित होता है।

7. राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव।


न्यूटन के गति के तीन नियमों में से एक नियम के अनुसार यदि कोई वस्तु गतिमान है तो वह गति करते रहना चाहती है और यदि जड़ अर्थात रुकी हुई अवस्था में है तो वह उसी अवस्था में बने रहना चाहती है जब तक कि उस पर कोई बाहरी बल ना लगाया जाए। ऐसा ही हाल बहुत से भारतीय राजनीतिज्ञों का भी रहा है कमजोर इच्छाशक्ति के कारण परिवर्तन के लिए बहुत कम राजनीतिज्ञ तैयार रहे हैं और कई महत्वपूर्ण फैसलों को टालते रहे हैं जो भारत वर्ष के विकास में बाधक रहे हैं।

8. विशेष क्षेत्रों पर ध्यान ना देना।


जब विश्व कि कई महत्वपूर्ण अर्थव्यवस्था में इलेक्ट्रॉनिक्स व आईटी दोनों क्षेत्रों में विकास कर रही थीं तब भारत केवल आईटी पर ध्यान दे रहा था जिस कारण इलेक्ट्रॉनिक्स का विकास नहीं हो पाया और चीन ने इसमें बाजी मार ली।यहां इलेक्ट्रॉनिक्स की बात विशेष रूप से इसलिए कर रहा हूं क्योंकि भारतवर्ष इलेक्ट्रॉनिक्स का बहुत बड़ा उपभोक्ता देश रहा है और हम इसके लिए अन्य देशों विशेषत: चीन पर निर्भर हैं।

9. रचनात्मकता का अभाव।


भारी भीड़, सड़कों पर अपार ट्रैफिक, हर काम के लिए घंटो लाइन लगाना, एक कमरे के घर में कई लोगों का रहना, भोजन में संपूर्ण पोषण का ना मिल पाना जैसे कारणों की वजह से युवाओं में रचनात्मकता का अभाव होता जा रहा है जो नए नए रोजगार पैदा करने वाले रचनात्मक कार्यों के लिए घातक है।


10. विकेंद्रीकरण का अभाव।


भारतवर्ष में कुछ क्षेत्रों में तो अच्छा विकास हुआ है परंतु बहुत सारे क्षेत्र अछूते रह गए हैं या बहुत कम विकास हुआ है। कुछ राज्यों की अर्थव्यवस्था संतोषजनक है तो कुछ की बहुत ही खराब। उदाहरण के लिए यदि हम दिल्ली को लें तो हम पाते हैं कि राजनीति, खेल, शिक्षा, रोजगार जैसी कई चीजों का केंद्र इसे बना दिया गया है।
इस वजह से क्षेत्र का विकास तो कई क्षेत्रों में हो गया परंतु बहुत सारे क्षेत्र जहां कुछ भी काम नहीं हुआ है इस विकास से अछूते रह गए।
हमें प्रत्येक राज्य, प्रत्येक मंडल, प्रत्येक जिला, प्रत्येक तहसील व प्रत्येक गांव स्तर तक विकास करने की आवश्यकता है ताकि केंद्रीयकरण को रोका जा सके। साथ ही उन युवाओं को पलायन करने से रोका जा सके जो अपने गांव कस्बों को छोड़कर शहर की तरफ भागते हैं और हमारे शहर इस भीड़ का स्वागत करने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं है।

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