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किसी बीमारी की दवा या वैक्सीन बनने की प्रक्रिया इतनी लंबी क्यों है?

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दवा या वैक्सीन बनने की प्रक्रिया इतनी लंबी क्यों? 

जब हम किसी बीमारी के लिए दवा खाते हैं या उससे बचने के लिए किसी टीके (वैक्सीन) का इस्तेमाल करते हैं तो इस प्रक्रिया को निपटाने में चंद सेकेंड लगते हैं। पर क्या आपको एहसास है कि किसी बीमारी के लिए दवा या वैक्सीन को विकसित करने में कितनी लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है और आखिर ऐसा क्या होता है जिससे इतना लंबा समय लगता है। 

यहां हम अपनी चर्चा को वैक्सीन पर केंद्रित रखेंगे परंतु लगभग यही सारी प्रक्रिया दवा के लिए भी सत्य है।

यदि हम इतिहास में झांक कर देखें तो हमने स्मॉल पॉक्स, रेबीज, पोलियो, कॉलरा, टाइफाइड आदि बीमारियों की वैक्सीन को सफलतापूर्वक विकसित किया है तथा इन बीमारियों को लगभग समाप्त कर दिया है। वहीं दूसरी तरफ एड्स बीमारी के लिए पिछले 20 साल से वैज्ञानिक लगातार काम कर रहे हैं परंतु अभी तक किसी वैक्सीन का विकास इसके लिए नहीं हो पाया है।

वर्तमान में बहुत सारे वैज्ञानिक कोरोनावायरस के लिए भी वैक्सीन का विकास करने की प्रक्रिया में लगे हुए हैं परंतु हम प्रभावी वैक्सीन प्राप्त कर ही लेंगे ऐसा पूरी तरह नहीं कहा जा सकता।

वैक्सीन बनाने की प्रक्रिया


आज हम समझेंगे कि किसी वैक्सीन को जब किसी बीमारी से बचने के लिए किसी को दिया जाता है तो उसे किन किन प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है और यह प्रक्रिया कितनी लंबी होती हैं और लगभग कितना समय लगने के बाद वैज्ञानिक सफलतापूर्वक वैक्सीन का निर्माण कर पाते हैं।

वास्तव में सफलतापूर्वक एक वैक्सीन को प्राप्त करने में 6 से 10 वर्ष लग जाते हैं। यहां हम यह समझने का प्रयास भी करेंगे कि विशेष परिस्थितियों में (जैसे कि वर्तमान में कोरोनावायरस की समस्या) इस समय को कहां तक कम किया जा सकता है। वैक्सीन को बनने में लगने वाला इतना लंबा समय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनाई जाने वाले कड़े मानकों की वजह से भी होता है। ये मानक वैक्सीन की प्रभाव कारिता तथा उस से होने वाले दुष्प्रभाव से बचने के लिए अति आवश्यक हैं।

यहां यह समझना भी आवश्यक है कि जिस बीमारी के लिए वैक्सीन तैयार की जाती है उस वैक्सीन में उसी बीमारी के वायरस कमजोर संस्करण के रूप में होते हैं। सामान्यता वैक्सीन को 3 तरीकों से तैयार किया जाता है।

1. इस तरीके में वायरस को निष्क्रिय कर दिया जाता है जिस कारण वायरस किसी प्रकार का संक्रमण अर्थात इंफेक्शन नहीं कर पाता है।

2. कोई वायरस अपने पूर्वजों के जेनेटिक कोड की कड़ियों का इस्तेमाल करते हुए विकसित होता रहता है। इनमें से कुछ कड़ियो को बहुत कमजोर करके वायरस को ऐसा बना दिया जाता है जिससे वह जीवित रहते हुए भी कोई नुकसान नहीं पहुंचा पाता।

3. इस तरीके में वायरस के जेनेटिक कोड की कुछ कड़ियों को हटा दिया जाता है जिससे यह वायरस कोई नुकसान नहीं पहुंचा पाता।

इन तीनों में से किसी एक प्रक्रिया से वैक्सीन का निर्माण किया जाता है और यह प्रक्रिया लैब में संपन्न की जाती है। इस प्रक्रिया में सामान्यतः 1 से 2 वर्ष लग जाते हैं।

इसके पश्चात वैक्सीन के ट्रायल की प्रक्रिया प्रारंभ की जाती है। यह ट्रायल सर्वप्रथम जानवरों पर तत्पश्चात मानव पर किया जाता है।

Animal Trial (जानवरों पर प्रयोग)

इसके लिए मुख्यतः चूहों तथा बंदरों का प्रयोग किया जाता है। इस प्रक्रिया में भी सामान्यतः 6 महीने से 1 वर्ष का समय लग जाता है। 90% से अधिक वैक्सीन व दवाइयां इस चरण को ही पार नहीं कर पाती और असफल हो जाती हैं।

Clinical Trial (मनुष्यों पर प्रयोग)

यदि एनिमल ट्रायल के नतीजे सकारात्मक रहते हैं तो इसे आगे क्लीनिकल ट्रायल के लिए भेजा जाता है। क्लीनिकल ट्रायल अर्थात मानव पर इसका प्रयोग क्रमबद्ध तरीके से तीन चरणों में किया जाता है।

प्रथम चरण

इस प्रक्रिया में 80 से 100 स्वस्थ वॉलिंटियर्स मनुष्यों का चयन कर उन्हें इस वैक्सीन की डोज दी जाती है। इस चरण का उद्देश्य खून में बनने वाले एंटीबॉडीज की मात्रा को जांचना तथा वैक्सीन के दुष्प्रभावों की पहचान करना है। वैक्सीन की डोज देने के बाद प्रत्येक वॉलिंटियर्स पर लगातार निगरानी रखी जाती है तथा आने वाले परिवर्तनों का डेटाबेस बनाया जाता है। इस डेटाबेस के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला जाता है कि इस वैक्सीन को देने से खून में पर्याप्त एंटीबॉडीज बनी हो तथा किसी प्रकार की कोई अन्य समस्या उत्पन्न न हुई हो। यदि कोई समस्या उत्पन्न हुई है तो उस वैक्सीन को वहीं पर रोक दिया जाता है तथा सब कुछ प्रारंभ से शुरू करना पड़ता है। परंतु यदि इस चरण में नतीजे सकारात्मक रहते हैं तो इस वैक्सीन को द्वितीय चरण के लिए भेज दिया जाता है।

द्वितीय चरण

द्वितीय चरण में वैक्सीन की डोज 500 से 1000 मनुष्यों को को दी जाती है। इनमें उन लोगों को विशेष तौर पर शामिल किया जाता है जिन लोगों को इस वायरस की चपेट में आने की ज्यादा संभावना रहती है। द्वितीय चरण एक लंबी प्रक्रिया है और इसमें 1 से 2 वर्ष लग जाते हैं। इस चरण के नतीजे सकारात्मक आने के बाद वैक्सीन को तृतीय चरण के लिए भेजा जाता है।

तृतीय चरण

तृतीय चरण में इस वैक्सीन की डोज 5000 से 10000 मनुष्यों को दी जाती है तथा नतीजों का डेटाबेस तैयार किया जाता है और यदि नतीजे सकारात्मक रहते हैं तो यह वैक्सीन संबंधित संस्था को अप्रूवल के लिए भेजी जाती है।

संस्था तैयार किए गए डेटाबेस की गहराई से जांच करती है तथा सब कुछ सही पाए जाने पर वह इस वैक्सीन को अप्रूव करती है इसके पश्चात इस वैक्सीन को बड़े पैमाने पर प्रोडक्शन के लिए

भेजा जाता है। इतने बड़े पैमाने पर डोज तैयार करने में तथा सभी लोगों तक इसकी पहुंच बनाने में 1 से 2 वर्ष लग जाते हैं।

चतुर्थ चरण

यह चरण वैकल्पिक होता है। ट्रायल के दौरान वैक्सीन या दवाइयां हजारों मनुष्यों को दी जाती है परंतु अप्रूवल के बाद यह लाखों-करोड़ों लोगों तक पहुंचती है। कई बार ट्रायल के दौरान दुष्परिणाम सामने नहीं आ पाते परंतु जब लाखों-करोड़ों लोगों के बीच इसका प्रयोग होता है तब इसके दुष्परिणाम सामने आने लगते हैं। उस परिस्थिति में कई बार उस दवा को बनाने वाली कंपनियां तथा कई बार उस देश की सरकार उन दवाइयों पर अथवा वैक्सीन पर रोक लगा देती हैं। इतिहास में यह घटना कई दवाइयों व वैक्सीन के साथ हुई है।

यहां आप अनुमान लगा सकते हैं इतनी सारी प्रक्रियाओं से गुजरने के कारण वैक्सीन अथवा दवा के बनने में इतना समय लग जाता है। विशेष परिस्थितियों में यदि विभिन्न संस्थाएं किसी वैक्सीन को विकसित करने में लगी हुई हो तो वे आपस में प्रयोग के परिणामों को एक दूसरे के साथ शेयर करके कुछ प्रक्रियाओं को जल्दी निपटा सकते हैं। चरण 2 तथा चरण 3 को एक साथ मिलाकर भी समय को कुछ कम किया जा सकता है।

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